रविवार, 26 अप्रैल 2015

जानिये कि मांसाहार क्यों अनुचित है ?


प्रचलित धारणा के अनुसार अपनी पसंद का आहार लेना व्यक्ति की स्वतंत्रता है| प्रायः आहार की इसी स्वतंत्रता का उल्लेख करके मांसाहार को उचित ठहराया जाता है| परन्तु मेरे विचार में ये धारणा ठीक नहीं है| किसी भी स्वघोषित-स्वतंत्रता के उपभोग से पूर्व मनुष्य को उसके परिणामों पर विचार लेना चाहिए| मांसाहार की प्रवृत्ति पर विचार करने पर ये स्पष्ट होता है कि ये अनुचित है और हमें इस तथाकथित स्वतंत्रता के उपभोग से बचना चाहिए| आईये समझते हैं कि मांसाहार से किस प्रकार की समस्यायें उत्पन्न हो रही हैं ?  

पर्यावरण प्रदूषण

मांस उद्योग पर्यावरण को सबसे अधिक प्रदूषित करने वाले उद्योगों में से एक है| यह जल के दुरुपयोग, मृदा अपरदन और जैव विविधता में ह्रास के लिए उत्तरदायी है| प्रमाण के तौर पर आप संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की ये रिपोर्ट पढ़ सकते हैं-

Livestock's long shadow: Environmental issues and options

मांस उद्योग किस प्रकार पृथ्वी पर उपलब्ध जीवनोपयोगी संसाधनों जैसे वन, मृदा, जल इत्यादि  की मात्रा और गुणवत्ता को हानि पहुंचा रहा है इसका विस्तार से विश्लेषण World Watch Institute की एक रिपोर्ट में भी किया गया है| इस रिपोर्ट को आप नीचे दिए गये लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं-

Is Meat Sustainable ? 


वर्तमान में वन, जल और मृदा जैसे सभी संसाधनों का संरक्षण आवश्यक हो गया है इसलिए मांस उद्योग को बढ़ावा देना मूर्खता है|

भूखमरी और निर्धनता

मांस उद्योग द्वारा प्रति किलोग्राम मांस उत्पादित करने के लिए लगभग दस किलोग्राम शाकाहार की आवश्यकता होती है| इसका अर्थ ये हुआ कि यदि कोई मांस खाना बंद कर दे तो अप्रत्यक्ष रूप से लगभग नौ लोगों का पेट भरेगा| मांस उद्योग में अनाज और जल के दुरुपयोग के कारण बाजार में इनकी कमी हो जाती है और मूल्य बढ़ जाता है| निर्धन लोग महंगे अनाज नहीं खरीद पाते और धीरे-धीरे कुपोषण के शिकार हो जाते हैं| ये नितांत मूर्खता है कि उपलब्ध अनाज को सीधे न खाकर उसे पशुओं को खिलाया जाए और फिर पशुओं को खाया जाए| इस संबंध में अधिक जानने के लिए पढ़े The Guardian समाचारपत्र का ये लेख- 

UN urges global move to meat and dairy-free diet

इस लेख में संयुक्त राष्ट्र संघ और अन्य प्रसिद्ध संस्थाओं का उल्लेख किया गया है जो यह प्रमाणित कर चुके हैं कि मांसाहार विश्व में निर्धनता और भूखमरी का कारण बनता जा रहा है| 

स्वास्थ्य

वैज्ञानिक खोजों से ये स्पष्ट हो चुका है कि अनाज से मांस बनने की प्रक्रिया में 90% उर्जा नष्ट हो जाती है और कई हानिकारक तत्त्वों जैसे कोलेस्ट्राल, संतृप्त वसा आदि का स्तर बढ़ जाता है| इसलिए मांसाहार कई प्रकार के रोगों जैसे हृदय रोग, कैंसर और मधुमेह आदि को बढ़ावा देता है| मांसाहार से कई रोग पशुओं से मनुष्यों में प्रसारित हो सकते हैं जैसे मिनीमाता रोग, बर्ड-फ्लू और स्वाइन-फ्लू आदि| इसके विपरीत शाकाहार स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है क्योंकि इसमें हानिकारक तत्त्व जैसे संतृप्त वसा और कोलेस्ट्राल आदि का स्तर कम होता है तथा फाइबर, कार्बोहाईड्रेट और एंटी-आक्सीडेंटस प्रचुर मात्रा में होते हैं| मनुष्य के शरीर को जितने तत्त्वों की आवश्यकता है वो सभी शाकाहार में किसी न किसी रूप में उपलब्ध हैं अतः स्वास्थ्य की दृष्टि से शाकाहार उत्तम है|

जीवन सभी को प्रिय है

जिस प्रकार हमें अपना जीवन प्रिय है उसी प्रकार पशु-पक्षी भी अपने जीवन से प्रेम करते हैं| जब किसी पशु/पक्षी को मारा जाता है तो वो भागने का प्रयास करते हैं और जब नहीं भाग पाते तो पीड़ा से छटपटाते और चिल्लाते हैं| कोई भी संवेदनशील मनुष्य कैसे किसी को इस भांति पीड़ा देने को उचित ठहरा सकता है? सब्जी काटते जब हमारी उंगली थोड़ी सी कट जाती है तो हम सिसक उठते हैं, तो पशुओं को गला कटने पर कितनी पीड़ा होती होगी ये हमें सोचना चाहिए|

मांसाहार के समर्थक प्रायः कुछ तर्क/प्रश्न करते हैं, उनके उत्तर दे देना आवश्यक है| इस प्रकार के महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर मैं यहाँ दे रहा हूँ-

(1) जीवन तो पौधों में भी है, तो क्या शाकाहार जीव-हत्या नहीं है ? यदि हाँ तो शाकाहार कैसे उचित माना जा सकता है ?

शाकाहार भी जीव-हत्या है पर मैं शाकाहार का समर्थन करता हूँ क्योंकि-

(अ) उचित और अनुचित का प्रश्न वहां उठता है जहाँ एक से अधिक विकल्प हों| जब एक से अधिक विकल्प हों तभी ये विचारणीय होता है कि हमें कौन सा विकल्प चुनना चाहिए? परन्तु जहाँ कोई विकल्प नहीं है वहां हमारा उत्तरदायित्व समाप्त हो जाता है| मांस का विकल्प शाक है किन्तु शाक का कोई विकल्प नहीं है| मांस खाने वालों को भी शाक खाना ही पड़ता है| 

(ब) मांस के त्याग से हम न केवल पशुओं को बचा ही सकते हैं बल्कि एक सीमा तक पौधों को भी बचा सकते हैं क्योंकि प्रति किलोग्राम मांस उत्पादन में 10 किलोग्राम शाकाहार खर्च होता है| इस प्रकार जिन्हें ये चिंता है कि शाकाहार पौधों के प्रति अन्याय है उन्हें भी शाकाहार अपनाना चाहिए क्योंकि मांसाहार अपनाकर वो 10 गुना अधिक पौधों की हत्या के कारण बन रहे हैं|

(2) जब प्रकृति ने हमें नुकीले दांत दिए हैं तो हम मांस क्यों न खाएं ?

प्राचीनकाल में मनुष्य अन्य हिंसक पशुओं की भांति शिकार करके मांस खाता था पर तबसे लेकर आज तक हमारे शरीर और मन का उद्विकास होता रहा है| किसी अज्ञात कारणवश हम अपने भीतर उच्चतर भावनाओं के विकास में सहयोग कर पाए और फलस्वरूप हमने कला, संगीत और साहित्य का सृजन किया| भले ही हमारे शरीर के कुछ अंग अभी भी वैसे ही हैं जैसे लाखों वर्ष पूर्व थे किन्तु भावनाएं विकसित हुई हैं| चुनाव हमारा है- शरीर के साथ लाखों वर्ष पूर्व लौट चलें या भावनाओं के साथ आगे बढे। हम नुकीले दांतो पर अटके रह सकते हैं और चाहें तो उससे ऊपर भी उठ सकते हैं|

वैसे भी हमारे नुकीले दांत मांसाहारी पशुओं के दांतों से भिन्न हैं| हमारे दांत मांस को चीरने-फाड़ने में सक्षम नहीं हैं| यदि हम अपने दांतों से कच्चा मांस खाना चाहें तो एक छोटे टुकड़े को ही चबाने में अत्यधिक समय लगेगा| यही कारण है कि हमें मांस पका कर खाना पड़ता है| हमारे नुकीले दांतों की उपयोगिता गन्ना चीरने जैसे कार्यों के लिए है|

(3) क्या मनुष्य के शरीर का तंत्र मांसाहार के लिए उपयुक्त नही है ?

मनुष्य के शरीर का तंत्र शाकाहार के लिए उपयुक्त  है, मांसाहार के लिए नहीं| मांसाहारी और शाकाहारी पशुओं के शरीर-तंत्र की तुलना से ये स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य के शरीर के लिए शाकाहार ही उचित है| इसे ठीक से समझने के लिए नीचे दी गयी तालिका को ध्यान से देखें-  

लक्षण
    मांसाहारी
  शाकाहारी  
    मनुष्य
चेहरे की पेशियाँ
कम विकसित
विकसित
विकसित
दांत (कैनाइन)
लम्बे, नुकीले, वक्राकार
कम नुकीले
छोटे और कम नुकीले
भोजन-ग्रहण
सीधे निगलते हैं
भोजन को चबाते हैं
भोजन को चबाते हैं
लार में पाचक-एन्जाइम
नहीं होता
होता है
होता है
आमाशय की अम्लता
pH 1
4 ≤  pH ≤ 5
 4 ≤  pH ≤ 5
आंत की लंबाई
शरीर से 3-6 गुना
शरीर से 10-12 गुना
शरीर से 10-12 गुना

(4) शाकाहारी लोग पशुओं पर अत्याचार का विरोध करते हैं पर स्वयं उनको बंधक बनाकर उनका दूध निकालते हैं| क्या ये पशुओं पर अत्याचार नहीं है ?

यदि पशुओं का दूध निकालकर पीना अत्याचार है तो उनकी हत्या करना तो इससे कई गुना अधिक बड़ा अत्याचार है| अतः जिन्हें पशुओं का दूध निकाले जाने पर दुःख होता है उन्हें सबसे पहले पशुओं की हत्या का विरोध करना चाहिए|

(5) यदि मैं ऐसे स्थान पर पहुँच जाऊं जहाँ शाकाहार न उपलब्ध हो तो क्या करूँ ?

ऐसी स्थिति में मांस खाने पर आपका कोई दोष नहीं होगा क्योंकि आपके पास विकल्प नहीं होगा| इसके अतिरिक्त ये प्रश्न अपने आप में स्पष्ट करता है कि यदि शाकाहार उपलब्ध हो तो मांस नहीं खाना चाहिए| 

(6) क्या मांसाहार के त्याग से पशुओं की सँख्या पारितंत्र को अव्यवस्थित नहीं कर देगी ?

ये अत्यंत हास्यास्पद प्रश्न है जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि मांसाहारी लोग पारितंत्र की सुरक्षा के लिए पशुओं को खा रहे हैं| सच ये है कि पशुओं की सँख्या अनियंत्रित ढंग से नहीं बढ़ सकती| अनेक पशु हैं जिन्हें हम नहीं खाते, उनकी सँख्या क्यों नहीं बढ़ जाती? इसके विपरीत मांस उद्योग में औषधियों के प्रयोग से अधिक से अधिक पशुओं को पैदा करवाया जा रहा है जिससे पारिस्थितिक तंत्र पर दबाव बढ़ रहा है| वैसे इस समय मनुष्य की जनसँख्या भी तेजी से बढ़ रही है तो क्या तो क्या अनुपयोगी मनुष्यों को खाया जाना वैध कर देना चाहिए?

(7) मांस के निर्यात से देश को विदेशी मुद्रा मिलती है| यदि ये उद्योग बंद हो जाए तो क्या देश की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव नहीं पड़ेगा ?

हमें कोई अधिकार नहीं है कि अर्थव्यवस्था के लिए किसी के जीवन को नष्ट करें| अर्थव्यवस्था के विकास के अन्य मार्ग भी हैं जिन्हें अपनाया जा सकता है|

(8)  हिन्दू समुदाय के बहुत से लोग केवल गाय की हत्या का ही विरोध क्यों करते हैं ? 

यह एक सामान्य घटना है| उदाहरण के लिए यदि कहीं कोई दुर्घटना हो जाए तो सर्वप्रथम पहले उन्हें बचाने का प्रयास करेंगे जिनसे आपके निकट संबंध रहे हैं| ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए क्योंकि जिनसे हमारे निकट संबंध होते हैं उनके कष्ट को हम अधिक गहराई से अनुभव करते हैं| इसी प्रकार हिन्दुओं के निकट संबंध गाय से रहे हैं क्योंकि हिन्दू घरों में गायें पाली जाती रही हैं| अतः ये स्वाभाविक है कि गाय की हत्या पर अधिकांश हिन्दुओं को अधिक पीड़ा होगी| परन्तु सभी पशुओं को जीने का अधिकार है और मनुष्य को किसी भी पशु पर अत्याचार नहीं करना चाहिए|

उपरोक्त तथ्यों को ध्यान रखते हुए हम ये कह सकते हैं कि शाकाहार ही मनुष्य के लिए उत्तम है| अतः संवेदनशील बनें, शाकाहारी बने और मांसाहार का त्याग करें|  

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