मंगलवार, 12 जनवरी 2016

विश्वास, मान्यता और असहिष्णुता



जब कभी साम्प्रादायिक दंगों में बच्चे अनाथ हो जाते हैं, जब कोई अपने नए विचारों के लिए सामाजिक तिरस्कार सहता है और जब किसी प्रेमी युगल को खाप पंचायतों द्वारा मृत्युदंड दे दिया जाता है तो हर संवेदनशील व्यक्ति के हृदय को कष्ट पहुँचता है| आजकल ऐसी घटनाओं पर प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रानिक मीडिया और सोशल मीडिया पर चर्चा छिड़ी रहती है जिससे लोग अनेक निष्कर्ष निकालते हैं| इनमें से एक निष्कर्ष ये होता है कि उपरोक्त समस्याओं के लिए लोगों के विश्वास और मान्यताएं उत्तरदायी हैं| मेरे विचार में ये निष्कर्ष ठीक नहीं है| ऐसा निष्कर्ष निकालने से पूर्व विश्वास और मान्यताओं की प्रकृति को समझना आवश्यक है| 


जब कोई व्यक्ति किसी तथ्य पर अपनी सहमति बिना उस तथ्य को परखे ही जताता है तो उसे विश्वास कहते हैं| किसी तथ्य पर विश्वास का कारण किसी श्रेष्ठ व्यक्ति या परंपरा द्वारा प्रमाणन होता है| जैसे लोग विश्वास करते हैं कि चन्द्रमा पर वायुमंडल नहीं है| कुछ वैज्ञानिकों को छोड़कर किसी ने ये परखा है कि चन्द्रमा पर वायुमंडल नहीं है, फिर लोग इस तथ्य में विश्वास रखते हैं क्योंकि इस तथ्य को वैज्ञानिकों ने (जो कि श्रेष्ठ माने जाते हैं) घोषित किया है| इसी प्रकार अनेक लोग बिना किसी प्रमाण के ही विश्वास करते हैं कि श्रीकृष्ण के रूप में ईश्वर पृथ्वी पर अवतरित हुए थे क्योंकि सनातन धर्म की परंपरा इसे घोषित करती है| जब किसी तथ्य पर अत्यधिक संख्या में लोग विश्वास करने लगते हैं तो उसे मान्यता कहा जाता है| सामान्य धारणा यह है कि विश्वास और मान्यता अंतर नही है परन्तु यथार्थ में ये भिन्न-भिन्न हैं| इनमें लगभग वैसी ही भिन्नता है जैसी कच्चे और पक्के घड़े में होती है| विश्वास कच्चे घड़े की भांति होता है जिसमें आकार तो होता है पर दृढ़ता और धारण करने की क्षमता अल्प होती है जबकि मान्यता पक्के घड़े की भाँति होती है जिसमें आकार के साथ-साथ दृढ़ता और धारण करने की क्षमता भी होती है| धारण करने की क्षमता का उल्लेख मैंने इसलिए किया क्योंकि न केवल मनुष्य विश्वास (या मान्यता) को धारण करता है अपितु स्वयं भी विश्वास (या मान्यता) के द्वारा धारण किया जाता है| विश्वास में जब दृढ़ता आती है तो वह मान्यता में रूपांतरित हो जाता है| विश्वासों का निर्माण और ध्वंस चलता रहता है परन्तु मान्यतायें अपेक्षाकृत स्थायी (शाश्वत नहीं) होती हैं| विश्वास मान्यता की अपेक्षा अधिक व्यक्तिगत होते हैं और मान्यताएं विश्वासों की अपेक्षा अधिक सामूहिक होती हैं|

मनुष्य का जीवन विश्वासों और मान्यताओं के आसपास ही घूमता है| मैंने सामान्यतया दो प्रकार के मनुष्यों को देखा/सुना है- प्रथम वो जो अपना जीवन पहले से स्थापित विश्वासों/मान्यताओं के आस-पास निर्मित करते हैं और द्वितीय वो जो नए  विश्वासों (नयी मान्यताओं की खोज नहीं की जा सकती, वो नए विश्वासों से स्वतः ही निर्मित होती हैं) की खोज करते हैं| इनमें से द्वितीय प्रकार के मनुष्य एक नए विषय संदेह को जन्म देते हैं| संदेह वह कारक या बुद्धि की अवस्था है जो किसी विषय के संबंध में पहले से स्थापित विश्वास/मान्यता के स्थान पर मनुष्य को नए विश्वास/मान्यताएं खोजने को प्रेरित करता है| कुछ लोग तर्क कर सकते हैं कि कुछ नया खोजने की प्रेरणा तो जिज्ञासा भी  देती है ! हाँ, सत्य है, परन्तु जिज्ञासा के लिए ये आवश्यक नहीं कि उस विषय पर पहले से कोई मान्यता स्थापित हो| जिज्ञासा तो सर्वथा नए विषय के संबंध में भी उत्पन्न हो सकती है| संदेह की उत्पत्ति विश्वास और मान्यता दोनों के स्तर पर हो सकती है| यदि संदेह करने वाला मनुष्य साहसी है तो वो कुछ नए तथ्यों की खोज कर सकता है जिस पर लोग विश्वास कर सकते हैं और आगे चलकर वो विश्वास मान्यता में भी रूपांतरित हो सकता है| अतः संदेह वास्तव में विश्वास/मान्यता का विकास (ध्वंस भी कह सकते हैं) है|

विश्वास, मान्यता और संदेह इन तीनों से भिन्न बुद्धि की एक और अवस्था होती है जिसे ज्ञान कहा जाता है| इसकी उत्पत्ति तब होती है जब हम उपलब्ध ज्ञानेन्द्रियों और तर्कों के माध्यम से किसी वस्तु के गुणधर्मों को जानते हैं| उल्लेखनीय है तर्क प्रायः कुछ मान्यताओं पर आधारित होते हैं, तो क्या तर्क के उपयोग से प्राप्त ज्ञान मान्यता नहीं होगा ? मेरे विचार में वो मान्यता नहीं अपितु उस मान्यता का चरम विकास होगा जिस पर तर्क आधारित था|

विश्वास, मान्यता और संदेह इन तीनों का समय के साथ प्रसार और संकुचन होता है अर्थात ये एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य तक प्रसारित या संकुचित हो सकते हैं, परन्तु ज्ञान का प्रसार नहीं होता| ज्ञान का प्रसार जब भी होता है तो वो अनिवार्य रूप से विश्वास अथवा मान्यता में रूपांतरित हो जाता है| ज्ञान के रूप में वह मात्र उसी मनुष्य तक सीमित रहता है जिसने उसे मूल रूप से जाना हो| ज्ञान होने के पश्चात विश्वास और मान्यता दोनों की भूमिका समाप्त हो जाती है परन्तु संदेह का महत्व बना रहता है| यद्यपि ज्ञान होने के पश्चात ऐसा प्रतीत होता है कि संदेह समाप्त हो गया, तथापि वह बीज रूप में विद्यमान रहता है| यही संदेह आगे चलकर ज्ञान के विकास और अद्यतन में मदद करता है| इस प्रकार विश्वास, मान्यता और ज्ञान ये तीनों ही परिवर्तनीय हैं और संदेह इन तीनों के साथ छिपे रूप में संलग्न होता है जो कि आवश्यकता पड़ने पर अपनी भूमिका निभाता है| 

उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि विश्वास और मान्यताएं बुद्धि के सामान्य लक्षण हैं| जीवन के इतने पक्ष हैं कि हम उन सबकी पुष्टि ज्ञान के द्वारा नहीं कर सकते| हमें कई तथ्यों पर बिना ज्ञान के ही विश्वास करना पड़ता है| ऐसे में विश्वासों और मान्यताओं को उन समस्याओं का कारण ठहराना निरर्थक है जिनका उल्लेख इस लेख के आरम्भ में किया गया है| मनुष्य की मनुष्य के प्रति असहिष्णुता अथवा क्रूरता का मूल कारण विश्वास या मान्यताएं नहीं हैं| क्रूरता, अन्धविश्वास और असहिष्णुता से जुड़ी समस्याओं का वास्तविक कारण मनुष्य में संवेदनहीनता और विवेकहीनता है| जब मनुष्य संवेदनहीन हो जाता है तो उसे दूसरों का कष्ट नहीं अनुभव होता और विवेकहीन मनुष्य उचित-अनुचित में भेद नहीं कर पाता| अतः हमारा बल मनुष्य को संवेदनशील और विवेकवान बनाने पर होना चाहिए न कि मनुष्य के स्वाभाविक गुणों की निंदा करनी चाहिए|

4 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " बेवक़्त अगर जाऊँगा " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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    1. मेरे लेख को ब्लॉग बुलेटिन में सम्मिलित करने हेतु धन्यवाद| मैंने ब्लॉग बुलेटिन का अवलोकन किया, बहुत सारे अच्छे लेखों को एक स्थान पर उपलब्ध कराने का आपका प्रयास सराहनीय है|

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  2. सबसे पहले तो मैं आपको सुंदर ब्लॉग लिखने के लिए बधाई देता हूँ |आपकी रचनाओ का मैं प्रशंसक हूँ |मेरा मानना हैं की "मान्यता वो चीज हैं जिस पर हम विश्वास करते हैं जिसको हम सही मान लेते हैं..मान्यता केवल सही हो सकती हैं कम से कम उसके लिए जो इस पर विश्वास करता हैं वैसे मान्यता दो प्रकार की होती हैं -empowering belief and disempowering belief....खुद मैंने इन सब पर अपने ब्लॉग पर काफी कुछ लिखा हैं ..परन्तु आपका लिखा पढ़के आनंद आया ,साधुवाद |शुभकामनाएँ |-डॉ अजय

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    1. अजय जी, मुझे अच्छा लगा ये जानकर कि आप इन विषयों में रूचि रखते हैं| मैं चाहूँगा कि आप अपने ब्लॉग का पता यहाँ दें जिससे मैं आपसे भी कुछ सीख सकूँ|

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