बुधवार, 30 मार्च 2016

भारत माता- विवाद, इतिहास और महत्व




कुछ समय पूर्व जब संघ प्रमुख मोहन भागवत ने विचार व्यक्त किया कि प्रत्येक भारतीय को भारत माता की जय कहना चाहिए तो देश में एक नया विवाद उठ खड़ा हुआ| प्रश्न उठाया गया कि क्या केवल भारत माता की जय कह देने से देश भक्ति सिद्ध होती है? कुछ मुस्लिम संगठनों ने फ़तवा जारी किया कि कोई भी मुसलमान भारत माता की जय कहे| हैदराबाद के सांसद ओवैसी ने कहा कि उनकी गर्दन पर चाक़ू भी रख दिया जाए तो भी वो भारत माता की जय नहीं बोलेंगे| उल्लेखनीय है कि इस्लाम धर्म में ईश्वर या पैगम्बर मुहम्मद का प्रतीक बनाने पर प्रतिबन्ध है| इस्लाम में केवल अल्लाह और पैगम्बर ही पूजनीय हैं| इसी आधार प वन्दे मातरम् और तिरंगे पर भी विवाद हो चुका है| पर कई मुस्लिमों ने इस धारणा को तोड़ा भी है जैसे कि जावेद अख्तर ने ओवैसी के कथन पर आपत्ति जताते हुए कहा कि भारत माता की जय कहना उनका अधिकार है| प्रसिद्ध संगीतकार . आर. रहमान ने भी 1997 में वन्दे मातरम् को माँ तुझे सलाम के रूप में प्रस्तुत किया था| पर आखिर ये भारत माता कौन हैं और इनकी क्या सार्थकता है? इसे समझने के लिए आईये थोड़ा इतिहास में चलते हैं|  

साधारणतया भारत माता को केसरिया रंग की साड़ी पहने हुए और हाथ में तिरंगा लिए हुए एक स्त्री के रूप में प्रदर्शित किया जाता है| कभी-कभी साथ में एक शेर को भी दिखाया जाता है| परन्तु इस प्रतीक का जो स्वरुप हम आज देखते हैं उसका एक रोचक इतिहास रहा है| भारत में धरती को प्राचीन काल से ही माता माना जाता रहा है परन्तु एक राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में मातृभूमि या भारत माता की अवधारणा 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में विकसित होनी आरम्भ हुई| सन् 1866 में बांग्ला लेखक भूदेव मुखोपाध्याय द्वारा लिखे गए व्यंग्य 'उन्नाबिंसा पुराण' में भारत को आदि भारती के रूप में चित्रित किया गया| इस संबंध में किरण चन्द्र बनर्जी का नाटक भारत माता भी उल्लेखनीय है जिसका प्रथम मंचन 1873 में हुआ था| तत्पश्चात बंकिम चन्द्र चटोपाध्याय ने 1882 में आनंदमठ नामक उपन्यास लिखा जिसका गीत वन्दे मातरम् बहुत प्रसिद्ध हुआ| अवनींद्र नाथ टैगोर ने 1905 में एक चित्र बनाया जिसमें उन्होंने भारत को चार भुजाओं वाली देवी के रूप में प्रदर्शित किया| इस देवी के चारों हाथों में क्रमशः पांडुलिपियाँ, धान की बाली, माला और सफेद वस्त्र था| जैसे-जैसे भारत का स्वतंत्रता संघर्ष आगे बढ़ा, भारत माता की धारणा भी विकसित होती गयी| इस प्रतीक के माध्यम से अनेक सन्देश प्रचारित किये जाने लगे| प्रायः भारत माता को जंजीरों में जकड़ा हुआ दिखाकर उनकी मुक्ति का आह्वान किया गया| ऐसे मार्मिक और हृदयस्पर्शी प्रतीकों ने भारतीयों को स्वतंत्रता संग्राम में आने वाली कठिनाईयों से जूझने के लिए उर्जा और उत्साह प्रदान किया| फणीश्वर नाथ रेणु ने अपने उपन्यास मैला आँचल में भारत माता के कष्ट को जिस हृदयस्पर्शी ढंग से व्यक्त किया है वह यहाँ उल्लेखनीय है-




"मैया जी के पाँव की चमड़ी फट गयी थी... लहू से पैर लथपथ हो गए थे| मैया जी का दुःख देखकर, रामकिशन बाबू का भाषण सुनकर और तिवारी जी का गीत सुनकर वह अपने को रोक नहीं सका था| कौन संभाल सकता था उस तान कोगंगा रे जमुनवा की धार नयनवा से नीर बही, फूटल भरतिया के भाग भारत माता रोइ रही... वह उसी समय रामकिशन बाबू के पास जाकर बोला था- "मेरा नाम सुराजी (स्वराजी) में लिख लीजिये|"

सुमित्रानंदन पन्त ने अपनी एक कविता में 'भारतमाता' का कष्ट कुछ इस भांति व्यक्त किया है-


भारत माता

ग्रामवासिनी।

खेतों में फैला है श्यामल,
धूल भरा मैला सा आँचल,
गंगा यमुना में आँसू जल,
मिट्टी कि प्रतिमा
उदासिनी।
दैन्य जड़ित अपलक नत चितवन,
अधरों में चिर नीरव रोदन,

युग युग के तम से विषण्ण मन,

वह अपने घर में
प्रवासिनी।


परन्तु भारत का चित्रण सदैव अबला नारी की भांति ही नही किया गया| सन् 1920 के पश्चात् चित्रकारियों में स्वतंत्रता सेनानियों को सामने और भारत माता को नेपथ्य में प्रेरणास्रोत की भाँति चित्रित किया गया| सन् 1936 में पहली बार शिव प्रसाद गुप्त ने बनारस में भारत माता के मंदिर का निर्माण करवाया जिसका उद्घाटन महात्मा गांधी ने किया था| उद्घाटन समारोह में महात्मा गांधी ने कहा-

"मैं आशा करता हूँ कि ये मंदिर, जो कि हरिजनों सहित सभी धर्मों, जातियों और पन्थों के लोगों के लिए एक सर्वदेशीय मंच की भांति कार्य करेगा, देश में धार्मिक एकता, शांति और प्रेम के प्रसार में महती भूमिका निभाएगा|"


सन् 1980 के दशक में स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि ने हरिद्वार में भारत माता का एक मंदिर बनवाया| इस मंदिर में देवी को एक हाथ में दूध का कलश लिए हुए और दूसरे में अनाज लिए हुए दिखाया गया है जो कि क्रमशः श्वेत क्रांति और हरित क्रांति का प्रतीक है|

स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलनों में वन्दे मातरम् और भारत माता की जय के उद्घोष क्रांतिकारियों में उर्जा का संचार करते थे| कठिन से कठिन परिस्थिति में भी क्रांतिकारी भारत माता की जय का उद्घोष करके संकल्प शक्ति से भर जाते थे| जब सत्याग्रहियों पर अंग्रेजों की निर्मम लाठियां बरसती थीं तो भारत माता का प्रतीक उनके संकल्प को डिगने से बचाता था| वो ये अनुभव करते थे कि ये कष्ट वो किसी निर्जीव भू-भाग और उसके करोड़ों अपरिचित निवासियों के लिए नहीं अपितु अपनी स्वयं की माता और उसकी संतानों के लिए सह रहे हैं| उस कठिन संघर्ष में अनेक सम्प्रदायों और जातियों के लोग सम्मिलित थे और उनको एकता के सूत्र में बाँधने में भारत माता के प्रतीक की एक बड़ी भूमिका थी| भारत माता की जय कहते हुए हजारों लोगों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया था| इस प्रतीक ने, जिसे आज के छद्म बुद्धिजीवी निरर्थक बता रहे हैं, स्वतंत्रता सेनानियों में अथाह उर्जा भर दी थी जिसने उन्हें अनवरत असहनीय कष्ट सहते हुए भारत के लिए संघर्ष करने में मदद की|

जवाहरलाल नेहरु ने अपनी पुस्तक डिस्कवरी आफ इंडिया में एक मार्मिक प्रसंग का उल्लेख किया है| जब स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान स्वतंत्रता सेनानी सार्वजानिक सभाओं में जाते थे तो लोग भारत माता के जयकारे लगाकर उनका स्वागत किया करते थे| एक बार नेहरु ने लोगों से पूछा कि वो भारत माता कौन है जिसकी वो लोग जय चाहते हैं? कुछ लोगों ने उत्तर दिया कि धरती ही भारत माता है| इस पर नेहरु ने पूछा कि क्या सिर्फ धरती ही या नदियाँ, पहाड़ और जंगल भी? लोगों ने कहा कि हाँ ये सब कुछ भारत माता है| फिर नेहरु ने पूछा कि क्या सिर्फ नदियाँ पहाड़ और जंगल ही, और कुछ नहीं? लोग चुपचाप नेहरु को देखते रहे| तब नेहरु ने कहा कि भारत माता में भारत के करोड़ों मनुष्य भी सम्मिलित हैं और हमारी जय ही भारत माता की जय है| ये सुनकर लोग और अधिक जोश से भारत माता की जय का उद्घोष करने लगे|


भारत में इतने धर्म, इतनी संस्कृतियाँ हैं की एकता की बात सोचना भी कठिन है| ऐसे में भारत माता का आँचल सबसे अच्छा माध्यम है जो हर धर्म, क्षेत्र और भाषा के लोगों को एक साथ समेट सकता है| इसी लिए हमारे संविधान निर्माताओं ने संविधान में लिखा कि उन प्रतीकों का सम्मान, रक्षा और प्रसार करना हमारा मूल कर्तव्य है जिनसे हमारा स्वतंत्रता संघर्ष प्रेरित हुआ था| ये प्रतीक हमें हमारे गौरवशाली स्वतंत्रता संघर्ष की स्मृति दिलाते हैं| पर आजकल कुछ राजनैतिक दल वही करने का प्रयास कर रहे हैं जो कभी मुस्लिम लीग ने किया था| सन् 1885 के पश्चात से ही कांग्रेस के अधिवेशनों में वन्दे मातरम् का गीत गाया जाने लगा था| ये गीत उन अधिवेशनों में भी गाया गया था जिनकी अध्यक्षता मुस्लिमों ने की थी परन्तु इनमें से किसी ने कभी कोई विरोध नहीं किया| परन्तु सन् 1938  में मुस्लिम लीग ने अपने कलकत्ता अधिवेशन में वन्दे मातरम् का विरोध किया| ये विरोध भारत की एकता के सूत्र के टूटने का चिन्ह था| इसके क्या विनाशकारी परिणाम हुए ये हम सब जानते हैं|

एक प्रश्न ये पूछा जाता है कि क्या ऐसे प्रतीक भारत की समस्याओं का निराकरण कर सकते हैं? ये प्रश्न ही अपने आप में अनुचित है क्योंकि प्रतीक समस्या का समाधान करने के लिए नहीं बल्कि प्रेरणा के लिए बनाए जाते हैं| आज भारत के सामने हजारों समस्याएं हैं और भारत जाति, धर्म और भाषा के आधार पर बंटा हुआ है| ऐसे में भारत माता का प्रतीक सभी को एक मंच पर लाने में सहायक हो सकता है| ये प्रतीक हमारे साझा अतीत, वर्तमान और भविष्य का प्रतीक हैं| भारत माता की जय कहना भारत की समस्याओं को नजरअंदाज करना नहीं अपितु समस्याओं से लड़ने का संकल्प लेने के समान है| जो लोग आज भारत की जय कहने से मना कर रहे हैं वो कभी उस भावना को नहीं समझ सकते जिससे ओत-प्रोत होकर हमारे क्रांतिकारियों ने हँसते हँसते फांसी के फंदे को चूम लिया था और जिसमें डूबकर अशफाक उल्ला खां ने इस्लाम के मूल अवधारणा से विपरीत जाकर अल्लाह से पुनर्जन्म (इस्लाम में पुनर्जन्म की धारणा नहीं है) की इच्छा व्यक्त की थी जिससे वो पुनः मातृभूमि के लिए संघर्ष कर सकें| ये लोग कैसे समझेंगे उस भावना को जिसमें डूबकर भारतीय महिलाओं ने क्रांतिकारियों को धन देने के लिए अपने मंगलसूत्र तक बेच डाले थे| ऐसे लोगों पर और इनकी समझ पर मुझे तरस आता है| यदि मेरे देश में करोड़ों लोग भूखे, अशिक्षित और शोषित हैं तो इसका ये अर्थ नहीं है कि मैं अपने देश को कोसता रहूँ और भारत के जय की कामना छोड़ दूँ| मुझे तो उत्साह और सकारात्मक सोच के साथ समस्याओं से लड़ना है और इसलिए मैं निःसंकोच कहता हूँ- भारत माता की जय ! जय हिन्द ! वन्दे मातरम् !

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